जीवन के अनिवार्य पहल: संगीत और योग


संगीत और योग की शिक्षा हर किसी को बचपन से ही मिलनी चाहिए और मैं तो यह समर्थन करती हूँ कि प्राथमिक विद्यालयों से लेकर उच्चतर माध्यमिक तक के विद्यालयों में संगीत विषय अनिवार्य होना चाहिए क्यूंकि प्रतेक व्यक्ति के जीवन में संगीत किसी न किसी रूप में जुड़ा है। कोई शास्त्रीय संगीत में रूचि रखता है तो कोई गजल, भजन व फिल्म संगीत में स हमारे संगीत में सात स्वर होते हैं और समस्त ब्रह्मांड स्वर और लय में बद्ध है। संगीत के आध्यात्म मनोविज्ञान, गणित, साहित्य सभी विषयों का समावेश रहता है। और तो और संगीत अभिव्यक्ति सार्वाधिक सरल और सशक्त माध्यम है। संगीत का विकास मानव सभ्यता के साथ हुआ है। मनुष्य ने जब न बोलना सीखा था और न लिखना तब वह अपने भावों, भावनाओं और उद्गारों से दूसरों को संगीत के माध्यम से ही परिचित कराता था।


संगीत कला का यह गुण है कि यह मानव के आत्मोत्थान के लिए प्रेरित करता है। सभ्य, शिष्ट और सुसंस्कृत बनता है। भेद-भाव से दूर रहकर एक साथ अनुशासन की राह पर चलना सिखाता है। दूसरों की भावनाओं का आदर करना सिखाता हैइसलिए संगीत की शिक्षा हर नागरिक के लिए अनिवार्य होनी चाहिए। संगीत का एक बड़ा और विशेष गुण यह है कि इसे याद करने के लिए दिमाग पर अधिक जोर देने की आवश्यकता नहीं पड़ती, अधिक मेहनत नहीं करनी पड़ती जैसे छोटे बच्चों को कोई अंग्रेजी या हिंदी कविता याद हो जाती है। इसी प्रकार दर्द भराकोई करुण गीत सुनकर मन बोझिल हो जाता है या देशभक्ति के जोशीले गीत सुनकर देश के लिए कुर्बान हो जाने की इच्छा होती है। इन्हीं गुणों के कारण रोते बच्चे को चुप कराने के लिए संगीत का प्रयोग होता है। 80% बीमारियाँ आज संगीत के माध्यम से दूर की जा रही हैं। क्यूंकि यह कला मानव मन के अधिक निकट है इसमें भावनाओं को तीव्र एवं शिथिल करने की क्षमता है और इसी अदभुत क्षमता का उपयोग करके संगीत चिकित्सा के क्षेत्र में नित, निरंतर सफलतायें प्राप्त की जा रही हैं। अंत में यह कह सकती हूँ कि संगीत इन्सान को प्रकृति का एक अनुपम वरदान है। इसके द्वारा इन्सान की अनेक जन्मजात प्रकृति प्रदत्त शक्तियों का सरलतापूर्वक विकास संभव है। संगीत सृजन, रचना कल्पना, एकाग्रता तथा स्मृति आदि शक्तियों का नरंतर विकास करता है।